सुकून के कुछ पल।

 

तारीख है आज,

मई,19

मैं कुच ढूंढ रही थी। वो मुझे मिल नहीं रहा। कई दिनों से परेशान हूं।

उसका मिलना मेरे लिए बहुत जरूरी है वरना अभी मैं काम के लिए निकल जाऊंगी। वही दिनभर की भाग दौड़। अरे कहा से पता करू कहा मिलेगा मुझे।

मैं हर रोज़ की तरह उसको फिर से ढूंढे की कोशिश करने के बाद तैयार होकर अपने काम पर निकल गई। इस उम्मीद मैं की कल शायद मुझे मिल जाए।

किसी को नही पता था ऐसी कौन सी चीज थी जो मैं हर रोज़ तलाशा करती थीं। काम खत्म हुआ अब घर जाने को तैयार हु। तभी मेरी सहेली का कॉल आया उसने बताया की वो कल मुझसे मिलने आ रही थी।

मैं काम से निकल कर बाजार की तरफ गई ताकी कल उसके आने का पूरा ध्यान रहे। अब मैं घर पर आ चुकीं थीं। सब साफ किया और उसकी तलाश में मैं फिर सोचने लगी की मुझे वो कब मिलेगा।


सवेरा हुआ मेरी दोस्त सनराइज से पहले ही आ गई थी। मुझे उसको देखकर खुशी हुईं। पार शौक हुआ की इतनी जला कैसे आ गई तुम?

उसने कहा चलो तुम्हे कुछ दिखाना हैं। मैं सोच में थी। क्या हैं जो ये दिखा रही हैं?

मैं उसके साथ गई वो एक बहुत सुंदर नजारा था। हा सच में, वो सनराइज का नज़राथा

बहुत ही ज्यादा सुंदर,, उसने कहा देखा तुमने ये कितना अच्छा दृश्य है।

इसको देखो तुम्हे क्या लगता है।

मैं,में, ,,,,, खुश होकर बोली मुझे मिल गया। हा सच मे मुझे मिल गया।

क्या मिल गया तुम्हे? वही जो रोज खोजती थी जो मुझे अपने रोज के काम में मिल ही नहीं पाया।

क्या?

"सुकून के कुछ पल"

आज सच में इसको देख कर वो दिन याद आते हैं। हम अपने काम मे इतना व्यस्त हो जाते है कि सुकुन के पल हमारे पास होते हुए भी हम उन्हें देख भी नहीं पाते। आज मुझे मेरे हिस्से के सुकून के पल मिल गए। में समझ गई कि रोज के काम के बाद आज मुझे काफी अच्छा लगा। अब कोशिश यही रहेगी की या सुकून के पल मैं अपनी रोज के काम मे फिर ना खो दु।

शुक्रिया की तुम आज मुझसे मिलने आई और मुझे अपना पल जीना का रास्ता मिल गया।

दोनो घर लौट आए। आज मैं बहुत खुश थी।

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